भारतीय संस्कृति मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है-डॉ. कुसुम।

जयपुर ब्यूरो रिपोर्ट।
मुक्त मंच की 60वीं मासिक संगोष्ठी यहां प्राकृतिक योग सदन में परमहंस योगिनी डॉ. पुष्पलता गर्ग के सानिध्य एवं प्रतिष्ठित भाषाविद्, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ नरेंद्र शर्मा कुसुम की अध्यक्षता में संपन्न हुई। ‘समावेशी संस्कृति और जनजीवन‘ विषय पर हुई इस संगोष्ठी में अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. नरेन्द्र शर्मा कुसुम ने कहा कि भारत की संस्कृति मानव संस्कृति का ही रूप-स्वरूप रही है। इसमें जो वरेण्य है, श्रेष्ठ है और जीवन का जो उत्तम अंश है वह समाहित है। समाज के परिवर्तित कालचक्र में इसमें कुछ विकृतियां आना स्वभाविक है।
भारतीय संस्कृति मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती है और इसमें वसुधैव कुटुंबकम का भाव निहित है। उन्होंने कहा कि यह आज भी करुणा, मैत्री, अहिंसा, सहिष्णुता, उदारता और मानवोचित गुणों को संपोषित कर रही है। हमारा कर्तव्य है कि इस संस्कृति में अपनी आस्था और विश्वास को डिगने नहीं दें और इसका मनसा, वाचा, कर्मणा से संरक्षण करें। विचारक इंद्र भंसाली ने कहा कि हमारी संस्कृति को भगवान महावीर और बुद्ध ने मजबूत किया है। बाद में डॉ. अंबेडकर और महात्मा गांधी ने इसे प्रतिरक्षित किया। हमारी संस्कृति सबसे पुरानी है, जबकि दुनिया की कई संस्कृतियां नष्ट हो गई। उन्होंने आरक्षण पर पुनर्विचार की बात कही। वरिष्ठ व्यंग्यकार, कवि फारूक आफरीदी ने कहा कि हमारी संस्कृति राष्ट्र की एकता और अखंडता के साथ सामाजिक सद्भाव में विश्वास पैदा करती है किंतु आज समाज में संकीर्णता और कट्टरतावादी शक्तियों के कारण जाति-धर्म-संप्रदायों में भेद करने वाले स्वर मुखर हो रहे हैं जो देश को अक्षुण्ण बनाए रखने में बाधक बनते जा रहे हैं। समाज के बुद्धिजीवी और जागरूक लोगों को आगे आकर प्रेम, करुणा, दया और सहिष्णुता और सौहार्द की धारा प्रवाहित करनी होगी।भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी ए. आर. पठान ने कहा कि जिस देश में समावेशी संस्कृति विकसित हुई वहां सर्वांगीण विकास हुआ, लेकिन आज फूट डालो राज करो की नीति के आधार पर विभिन्न समाजों को लड़ाया जा रहा है। इससे देश के पिछड़ने का खतरा बढ़ गया है।अणुव्रती चिंतक एवं समाजसेवी पंचशील जैन ने कहा कि हम गंगा-जमुनी संस्कृति का गुणगान करते नहीं थकते लेकिन दूसरी ओर हिंदु-मुस्लिम विवाद, एससी, एसटी, पिछड़े वर्गों के साथ दुव्र्यवहार से हमारा सद्भाव खतरे में पड़ जाता है। हमे सबको साथ लेकर चलना होगा।डांग क्षेत्र विकास समिति के पूर्व अध्यक्ष एवं भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी (रिटा.) डॉ सत्यनारायण सिंह ने कहा कि आज समावेशी संस्कृति का अर्थ बदलता जा रहा है। इसकी नई व्याख्या से संकट बना हुआ है। आज एक दूसरी जाति और धर्म के प्रति वैमनस्य का भाव दिखाई देता है जो एकता के लिए खतरे का संकेत है। इसके लिए राष्ट्र विरोधी ताकतों से सख्ती से निपटने की जरूरत है। इंजीनियर डी.पी. चिरानिया ने कहा कि हमारी पूजा-अर्चना पद्धति भिन्न हो सकती है, लेकिन विविधता में एकता ही हमारी शक्ति है। आईएएस (रिटा.) अरुण ओझा ने हमारे यहां एक-दूसरे धर्म के प्रति तनाव अवश्य रहा है, परंतु हमने समन्वित संस्कृति को अपनाया है। हमारी संस्कृति में लचीलापन और सबको साथ लेकर चलने का सामर्थ्य है। इसलिए हमारी संस्कृति विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। वित्तीय विशेषज्ञ एवं साहित्यकार राजेंद्र शर्मा ने कहा कि हमारी संस्कृति में जो विकृतियां आ गई हैं उन्हें दूर करने का दायित्व सहिष्णु समाज, बुद्धिजीवी वर्ग और शासन का है। कार्यक्रम का संयोजन करते हुए मुक्त मंच के संयोजक वरिष्ठ साहित्यकार श्रीकृष्ण शर्मा ने कहा कि अनेकता में एकता और वसुधैव कुटुंबकम का भाव मजबूत करने की आवश्यकता है। धार्मिक ठेकेदारों द्वारा खड़े किए जाने वाले विवाद अस्थाई हैं। जनमानस के आगे उन्हें परास्त होना पड़ता है। गोष्ठी में भूपेंद्र कुमार शर्मा, रमेश खंडेलवाल ने भी विचार व्यक्त किए। आईएएस (रिटा.) विष्णु लाल शर्मा ने आभार व्यक्त किया।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ARwebTrack