क्या यह जीव 70 लाख साल पहले दो पांवों पर चलता था ? - डॉ. रामावतार शर्मा

आज से 20 साल पहले चाड नामक देश में लंबी हड्डी का एक जीवावशेष यानि फॉसिल  मिला था जिसकी पिछले दो दशकों से जांच चल रही है। अति पुरातीन अवशेषों का अध्ययन एक बहुत ही धीमा कार्य होता है क्योंकि जीववावशेष का अध्ययन करने के साथ साथ उसे सुरक्षित भी रखना पड़ता है। इसके अलावा विज्ञान कोई विश्वास आधारित धार्मिक यात्रा तो है नहीं कि बस श्रद्धा जाग्रत हुई और सब लोग उसे सत्य मानने लगें। वैज्ञानिकों में हर विचार पर तीव्र मतभेद होते रहते हैं। मत, सिद्धांत या परिकल्पनाएं बनती रहती हैं और उनका प्रबल प्रतिरोध या समर्थन होता रहता है और एक लंबे समय के बाद सत्य का कोई अंश सामने आता है और विशेषकर उस स्थिति में जब कोई जीवाश्म सत्तर लाख साल पुराना हो। जी हां! चाड में मिला यह फॉसिल तकरीबन 70 लाख साल पुराना है।

कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि यह हड्डी का जीवाश्म मनुष्य के उस अति प्राचीन रिश्तेदार का हो सकता है जो धरती के उन रास्तों पर चला होगा जहां हम आज चल रहे हैं। यह जीव आज तक का मनुष्य का सबसे करीबी रिश्तेदार है जिसके अवशेष मिले हैं। यह खोज 2001 में कैनेडियन और चाड के पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा की गई थी जिसमें उन्होंने एक खोपड़ी की खोज की थी जिसका नाम रखा गया तौमई जिसका चाड की दाजा भाषा में मतलब होता है जीवन की आशा। पॉयटियर्स विश्वविद्यालय पेरिस के माइकल ब्रुनेट इस खोजी टीम का नेतृत्व कर रहे थे। इस खोपड़ी में मस्तिष्क छोटा रहा होगा। दांत और मुख भी मनुष्य से छोटा रहा होगा। हड्डियों के इन जीवावशेषों में ऑड मेडिना नामक एक छात्रा ने फीमर यानि जांघ की हड्डी की पहचान की। इस हड्डी को देख कर अंदाजा लगाया गया कि संभवतया यह जीव दो पांवों पर चलता होगा।

     2001 से 2017 तक इस फीमर हड्डी पर कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। पर पिछले चंद वर्षों के अध्ययनों के उपरांत कुछ प्रारंभिक झिझक के बाद अब यह आम सहमति सी बनती जा रही है कि शायद यह फीमर उस जीव की है जो मनुष्य की तरह दो पांवों पर चलता होगा। पर ध्यान रहे इतने पुराने अवशेष सत प्रतिशत प्रमाण नहीं दे सकते हैं। एक बात तो यह बात पूर्णतया सिद्ध होना बाकी है कि यह खोपड़ी और फीमर एक ही जीव की हैं। दूसरी बात जिस पर ध्यान देना आवश्यक है वह है कि जांघ की जिस हड्डी में मोड़ है जिसको दो पांवों पर चलने का आधार माना जाता है वह लाखों सालों के प्राकृतिक दबाव से भी बन सकता है। विज्ञान विरोधाभाषों के बीच में सत्य और तथ्य की तलाश है। यहां कोई अंधभक्ति नहीं कि किसी एक प्रसिद्ध विशेषज्ञ ने कह दिया तो दूसरे ने बिना प्रतिरोध मान लिया। इसी आपसी सहमति और असहमति की रस्साकस्सी से विज्ञान का सत्य उजागर होता है।

अब आने वाला समय ही बताएगा ये जीवावशेष मानव के पूर्वज के हैं या चिम्पांजी या फिर कोई लुप्त हुए जीव के।

वैज्ञानिकों और पुरातत्व विशेषज्ञों  की यह यात्रा अनंत काल तक चलती रहेगी जब तक धरती पर मानव के उद्भव की पहेली समझ में नहीं आयेगी।

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