मरुदीप उतना रोमांटिक नहीं होता है - डॉ. रामावतार शर्मा

विशाल रेगिस्तान के मध्य में खजूर के पेड़, कुछ झोंपड़े,  पपड़ी जमे होठों की प्यास बुझाते पानी का चश्मा और श्वेत परिधानों में लिपटे बाशिंदे। कितनी रोमांटिक परिकल्पना है यह सब। पर तपती बालू की वास्तविकता कुछ और ही होती है। इस परिकल्पना के आसपास जो मरूदीप आता है उसका नाम है औलाद सईद मरुदीप। यह ओएसिस अल्जीरिया के रेगिस्तान में है और इसके पास में एक लघु संप्रदाय बसता है जो कि इस मरुदीप के पास कुछ खेती बाड़ी करता है। मिट्टी के रंगों से सजे झोंपड़े और बहुरंगी वस्त्रों में लिपटी महिलाएं इस क्षैत्र को अलग ही रूप देते हैं। यह जलस्रोत विश्व के सबसे बड़े रेगिस्तानी टीले ग्रैंड एर्ग ऑक्सिडेंटल के पास में ही है।

इस इलाके का दिन का तापमान जहां +50 डिग्री सेल्सियस होता है वहीं रात को समुद्र से उठने वाली शीत हवाओं के कारण -10 डिग्री सेल्सियस हो जाता है। यहां के किसानों को तापमान के इस अत्यधिक परिवर्तन के बीच सब्जियां, अंगूर, अंजीर, खजूर और आडू आदि की खेती करनी पड़ती है। यहां के लोगों के लिए खजूर एक जीवनदायी पेड़ है। लोगों में किवदंती है कि जब खुदा ने इंसान बनाया तो जो मिट्टी बच गई थी उससे खजूर बनाया गया। लोग इस तरह से खजूर के पेड़ को मनुष्य का विस्तार मानते हैं।

अब एक सहज सी जिज्ञासा उभरती है कि बालू मिट्टी के इस वृहद विस्तार में यह पानी कहां से आ गया ? मरुदीप यानि ओएसिस रेगिस्तान की गहराई में स्थित चट्टानी घाटियों में पानी इकट्ठा होने से बनता है। साल दो साल में जब भी तेज बारिश होती है तो पानी तेजी से इस चट्टानी तलहटी में इकट्ठा हो जाता है। चूंकि ऊपर रेत की मोटी परत होती है तो यह पानी उड़ता नहीं है। इस पानी को लंबी लंबी सुरंग खोद कर सिंचाई के लिए नीचे की जमीन पर लाया जाता है जहां एक ओएसिस विकसित होता है। कुछ सुरंगें तो 16 किलोमीटर तक लंबी होती हैं। ये सुरंगें प्राचीन काल में अफ्रीका  से पकड़ कर गुलाम बनाए गए लोगों के बलिदान की प्रतीक हैं क्योंकि उन्ही मजबूर लोगों ने सामान्य कुदालों से भीषण गर्मी में ये सुरंगें खोदी थी। इस कार्य को सम्पन्न करने में माना जाता है कि कितने ही गुलाम मर गए थे। हर नखलिस्तान किन्ही मजबूर इंसानों की आखिरी सांसों से महका है।

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