त्रस्त है महंगाई से जन-जवान !! - सीए सीएल यादव

सीए सीएल यादव
कमरतोड़ महंगाई व बेरोज़गारी के कारण देश में हाहाकार मचा हुआ है व आर्थिक असमानता की खाई निरन्तर बढ़ती जा रही है।
गरीब-अमीर, आम और ख़ास, जन-जवान, बच्चे-वृद्ध हर वर्ग महंगाई से त्रस्त है। तमाम प्रयासों के बावजूद खुदरा महंगाई लगातार कई महीनों से नियंत्रण के बाहर अपेक्षित स्तर से बहुत ज़्यादा बनी हुई है । थोक महंगाई को तो मानो पंख ही लगे हुए हैं ।थोक महंगाई ने तो पिछले क़रीब डेढ़ साल से दहाई के अंक से नीचे नहीं आने की जैसे सौगंध ही ले रखी हो ।थोक महंगाई दहाई के आँकड़े में बढ़ने का लगातार रिकॉर्ड बना रही है! यहीं नहीं कई कई बार तो 15% से ऊपर तक थोक महंगाई बढ़ने की दर दर्ज की गई हैं ।
इसके विपरीत केंद्र सरकार के तमाम संस्थान महंगाई की भयावहता को सार्वजनिक रूप से स्वीकार ही नहीं करना चाह रहे व न ही कोई ठोस उपाय महंगाई नियंत्रण को लेकर लेते दिखाई देते हैं । बल्कि दिनों दिन आम जनता पर जीएसटी व अन्य अप्रत्यक्ष करो का भार डाला जा रहा है जिसके कारण आम उपभोग की वस्तुओं आटा, दाल, अनाज, कपड़ा, दुध, दही, छाछ,हवाई चप्पल की क़ीमतों में काफ़ी उछाल देखने को मिल रहा है ।
अनियंत्रित महंगाई के बावजूद सरकार बढ़े हुए कर संग्रहण के ख़याली आँकड़ों को देखकर आत्ममुग्ध होकर बैठी है व लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कमोबेश शुतुरमुर्ग की भूमिका का ही निर्वहन कर रहा है । कोई भी ज़मीनी हक़ीक़त व जनता कि परेशानियों को न तो  सुनना व न ही समझना चाहते है ।
 रिज़र्व बैंक ने ज़रूर शुरुआती ना नुकर के बाद महंगाई को नियंत्रण से बाहर मानते हुए, कुछ कठोर कदम उठाए हैं व रेपो दर में पिछले महीनों के दौरान 150 बैसिक पॉइंट की बढ़ोतरी के साथ बाज़ार में तरलता को हतोत्साहित करने वाले अन्य कदम भी उठाए हैं, जो प्रत्यक्षतः महंगाई को क़ाबू करने वाले कदम माने जा सकते हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से आने वाले समय में महंगाई को बढ़ाने वाले ही साबित होंगे क्योंकि ये सारे कदम उत्पादन व सेवाओं की लागत को ही बढ़ाने वाले ही साबित होंगे, जो देश की जीडीपी में गिरावट का भी बड़ा कारण बन सकता है ।

हाल ही में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (कांग्रेस) ने अनियन्त्रित महंगाई, बेरोज़गारी व लगातार आर्थिक असमानता को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में “हल्ला बोल रैली व विरोध प्रदर्शन” किया था, में जो स्वतस्फूर्त अप्रत्याशित जन सैलाब उमड़ा, को देखकर तो लगता है कि भयंकर आक्रोश व ग़ुस्सा है आमजन मे । 
यही नहीं, कांग्रेस नेता राहुल गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी द्वारा कन्याकुमारी से कश्मीर तक की पैदल पदयात्रा, “भारत जोडो यात्रा” के शुरुआती दिनों में उमड़ रहे जनसैलाब को देखकर भी यही लगता है कि, देश की जनता महंगाई, बेरोज़गारी, आर्थिक असमानता जैसे देशव्यापी ज्वलंत मुद्दों के खिलाफ लामबंद होकर विरोध में उठ खड़ी हो चुकी हैं।

अब सवाल उठता है कि क्या खुदरा महंगाई की 5-7 की दर भारत जैसे विशाल व विकासशील देश के लिए कष्टकारी क्यों बन रही है जबकि अतीत में महंगाई को बरदान व देश के आमजन की आर्थिक सम्पन्नता व विकास का प्रतीक माना जाता था ?
क्या आज हालात आमदनी चवन्नी, खर्चा रूपया वाले तो नही बन गये हैं ?
क्या देश में उत्पादन की बजाय खपत व माँग ज़्यादा है या माँग की कमी व करो के भार के कारण उत्पादन व वितरण लागत बढ़ रही है के कारण महंगाई है?

इन उपरोक्त सवालों के जवाब वैसे तो मैं पाठकों से जानना चाहूँगा, लेकिन फिर भी मेरी समझ में आज महंगाई की भयावता का मुख्य कारण है देश के आम नागरिकों की आमदनी में भारी गिरावट, ऐतिहासिक बेरोज़गारी व उपभोक्ता वस्तुओं व खाघान्न के भावों मे अनियन्त्रित बढ़ोतरी है ।
आमजन का कहना है कि मोदी सरकार के 8 साल के अच्छे दिनों वाले कार्यकाल में, आमदनी घटकर रह गई आधी व महंगाई हो गई दुगुनी । ऊपर से बेरोज़गारी की चोट यानी की रोज़गार नये पैदा होने की बजाय जो थे वो भी छिन रहे हैं, सरकारी उपक्रमों का अन्धाधुन्ध निजीकरण हो रहा है, देश में सर्वाधिक रोज़गार पैदा करने वाला असंगठित क्षेत्र अपनी अंतिम साँसे ले रहा है वहीं खेती बाड़ी व पशुपालन के प्रति लोगों का मोहभंग हो रहा हैं क्योंकि सरकारी प्रोत्साहन की लगातार कमी व डीज़ल,खाद व अन्य उत्पादों की बढ़ती क़ीमतों के कारण लागत बढ़ रही हैं व बिचौलियों की ज़बरदस्त जमाख़ोरी व मुनाफ़ाख़ोरी के कारण उचित भाव नहीं मिल पाते हैं, सरकार लागत का डेढ़ गुना एमएसपी के वादे से मुकर रही है वहीं इसके उलट,  सरकार द्वारा एकाधिकारवादी नीतियों को प्रोत्साहित किये जाने के कारण, आमजन को वही उत्पाद ऊँचे भावों पर मिलते हैं ।

कृषि व असंगठित क्षेत्र के लगातार कमजोर होने के कारण जहां, एक तरफ़ बेरोज़गारी बढ़ रही हैं व दुसरी तरफ़ कृषि व अन्य उत्पादन में कमी के कारण खाद्य वस्तुओं व अन्य उत्पादो की लगातार कमी के कारण,  महंगाई अनियंत्रित बनी हुई है ।
 कोढ़  में खाज का काम किया, अतार्किक नोटबन्दी, आधी अधूरी तैयारी के साथ लागू की गई जीएसटी ने।  जिसके कारण देश का कृषि, कुटीर व लघु उद्योग काफ़ी बुरी तरह प्रभावित हुआ। ऊपर से अपनी नाकामियों व कुशासन को छुपाने के लिए थोपे गए अनियोजित लॉकडाउन व पेट्रोल डीज़ल पर भारी भरकम एक्साइज ने तो रही सही कसर ही पुरी कर दी।एक फलती फूलती अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया । तमाम विपरीत हालातो का सामना करते हुए जो उद्यमी, आशान्वित थे अच्छे दिनों के लिए, व अपने सर्वाईवल के लिए संघर्ष कर रहे थे वो भी लॉकडाउन का सामना नहीं कर पाये व खड़े नहीं रह पाए व अन्ततः बन्द हो गए ।

2016 यानि कि नोटबन्दी के बाद से देश की अर्थव्यवस्था व जीडीपी में लगातार गिरावट जारी है व आज देश की अर्थव्यवस्था बहुत ही बुरे दौर से गुजर रही है । सिर्फ़ व सिर्फ़ हेडलाइन्स मैनेजमेंट चल रहा है, मैक्रो इकनॉमी को बहुत मज़बूत दिखाने की लगातार कुचेष्टा हो रही है जबकि ज़मीनी हालात या यों कहें कि माइक्रो इकनॉमी के हालात बहुत ही ख़राब व कमजोर है ।
आज देश में जो हालात महंगाई, बेरोज़गारी व आर्थिक मन्दी के बने हुए है यानि कि यों कहें कि एक तरफ़ आमजन के पास रोज़गार नहीं है, इसलिए आमदनी नही है । दुसरी तरफ आमदनी नही है तो खर्च करने के लिए पैसा नहीं है । आमजन के पास खर्च करने के लिए यदि  पैसा नहीं है तो उत्पादक व निर्माण करता के उत्पादों व सेवाओं को ख़रीदेगा कौन ? इस लिए निर्माण व उत्पादन गिर रहा है। पीएमआई में लगातार गिरावट का दौर देखने को मिला।  जिसका परिणाम प्रति इकाई निर्माण लागत बढ़ रही है । परिणामतः सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में निरन्तर गिरावट का दौर जारी है । यानी की ये तमाम हालात स्टैगफ्लैशन के दौर से गुजरती देश की अर्थव्यवस्था को बया कर रहे है यानि कि महंगाई, मन्दी व बेरोज़गारी से त्रस्त आमजन ।
पुनश्च : क्या केंद्र सरकार अतार्किक व अमानवीय करारोपण के परिणाम स्वरूप बढ़ते रिकॉर्ड तोड़ कर संग्रहण, जैसा प्रचारित किया जा रहा है, के आँकड़ों की आत्ममुग्धता से बाहर निकल कर ज़मीनी हक़ीक़त को स्वीकार करते हुए आमजन को महंगाई से राहत दिला पायेगी?
क्या पेट्रोल डीज़ल पर एक्साइज में राहत देते हुए सिन व प्रोग्रेसिव टेक्स सिस्टम पर ध्यान देकर आमजन को आटे दाल दुध दही पर थोपे गये अनुचित व तर्कहीन करो से राहत दे पायेगी ? 
क्या अपनी रेगुलेटरी शक्तियों को सामंजस्यपूर्ण बनाते हुए अन्धाधुन्ध निजीकरण व पुजीवादी एकाधिकारवाद पर अंकुश लगाने के साथ ही आर्थिक समाजवाद को स्थापित करने के लिए कटिबद्ध है ?

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ARwebTrack