नई फ़िल्म पर्यटन नीति से किसका भला होगा कोई नहीं जानता।


राजेन्द्र बोड़ा-वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक।

राज्य सरकार ने ‘राजस्थान फ़िल्म टूरिज़्म प्रमोशन पॉलिसी 2022’ घोषित की है। इस नीति के दो भाग है। पहला तो इस पॉलिसी के शीर्षक वाला भाग तथा दूसरा ‘राजस्थानी भाषा में फिल्म निर्माण प्रोत्साहन एवं अनुदान नीति’ का भाग। शासन में यही होता आया है कि शासकीय नीतियां लोक प्रतिनिधि नहीं सचिवालय के अधिकारी बनाते हैं। उन्हें बनाने में उन हितधारकों की कोई भूमिका नहीं होती जो इस नीतियों से प्रभावित होने वाले होते हैं। बताया जाता है कि इस फ़िल्म नीति को बनाने के पहले राजस्थान के फ़िल्मकारों को बुलाया कर यह पूछने की औपचारिकता जरूर पूरी की गई कि बताइए आपको इस नीति में क्या चाहिए। कुछ लोगों से कहा गया कि वे अपने सुझाव ई-मेल से भेज दें। कुछ ने भेजे भी। मगर अंत में विभिन्न राज्यों की पॉलिसियों को लेकर कट पेस्ट जैसा कुछ करके इस नीति का प्रारूप बना लिया गया। मगर उसके प्रारूप पर फ़िल्म व्यवसाय और फ़िल्म कला से जुड़े लोगों के साथ कभी कोई संवाद या मंथन नहीं हुआ। मौजूदा राजनीतिक कोलाहल के दौर में सरकार जिस प्रकार रस्म अदायगी कर रही है वही इस नीति में भी बयान होता है। इस नीति के अंतर्विरोध तो इसकी प्रचार पुस्तिका के लिए दिये गये मुख्यमंत्री के संदेश से ही सामने आने लगते हैं जिसमें मुख्यमंत्री कहते हैं कि “राजस्थान अपनी विशिष्ठ भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विशेषताओं के कारण देश और दुनिया में विशेष पहचान रखता है। प्रदेश के समृद्ध स्थापत्य कला से युक्त दुर्ग, महल, मंदिर, हवेलियां, स्मारक, जलाशय झीलें बावड़ियां विश्व विख्यात हैं। यहां के नैसर्गिक सौन्दर्य से सरोबार आबू पर्वत, सुनहरी बालू के टीलों से सजा मरुस्थल, और लोक संस्कृति के विविध रूप फिल्म जगत के लिये आकर्षण का केंद्र रहे हैं।
यही कारण है कि प्रदेश में क्षेत्रीय भाषाओं के साथ हिन्दी और अनेक विदेशी भाषाओं की फ़िल्मों की शूटिंग और उनके प्रदर्शन से राजस्थान की सतरंगी संस्कृति का व्यापक प्रचार प्रसार होता रहा है”। जब ऐसा शानदार काम पहले से ही है तब नई नीति की क्या जरूरत आन पड़ी? सच तो यह है कि दो भागों वाली यह नीति संकल्पना के स्तर पर ही स्पष्ट नहीं है। शासन फ़िल्मों के जरिए राजस्थान में पर्यटन को बढ़ा कर कमाने का व्यावसायिक मॉडल चाहता है, या राजस्थानी भाषा, कला और संस्कृति तथा इस भाषा की फ़िल्मों के निर्माण को बढ़ावा देना चाहता है? किसी ने तो यह टिप्पणी तक की है कि “पर्यटन के पोषण के लिए कला-संस्कृति का शोषण किया जा रहा है।” सरकार का अपना प्रशासनिक अंतर्विरोध भी इस नीति में आ गया है।
पहले पर्यटन तथा कला और संस्कृति का एक ही विभाग होता था। फिर सरकार ने विषयों के दो अलग विभाग बना दिये। अब तो दोनों विभागों के मंत्री भी अलग-अलग हैं मगर इन दोनों ही विभागों का प्रशासनिक सचिव एक ही है। ऐसे प्रशासनिक अंतर्विरोधों को न समझ पाने वालों से विषय की गंभीरता की क्या अपेक्षा की जा सकती है। भले ही अकादमिक दृष्टि से कहा जा सकता है कि पहली राजस्थानी फिल्म ‘निज़राणों’ 80 बरस पहले 1942 में बनी, परंतु व्यावहारिक दृष्टि से राजस्थानी फिल्म निर्माण की शुरुआत उसके बीस बरस बाद 1961 की ‘बाबासा री लाड़ली’ से ही मानी जाएगी। इस फिल्म की बॉक्स ऑफिस सफलता तथा इसके गानों की धूम से राजस्थानी फिल्म निर्माण की राह तो बन गई। मगर वह ऐसे किसी लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकी जहां राजस्थानी सिनेमा की अलग पहचान स्थापित हो सकती। राजस्थानी सिनेमा का स्वरूप इस प्रदेश की संस्कृति और भाषा से ही बन सकता है। जितने भी क्षेत्रीय सिनेमा पनपे हैं वे सब अपने क्षेत्रों की भाषा और संस्कृति की मजबूत नींव पर खड़े है। 
राजस्थानी सिनेमा को बनाने की तो अभी नींव ही नहीं खुदी है। राजस्थानी सिनेमा की इमारत यहां की भाषा और संस्कृति की बुनियाद पर ही खडी हो सकती है। दुर्भाग्य से प्रदेश की संस्कृति शासन में बैठे लोगों की प्राथमिकता में कहीं नहीं है।कला-संस्कृति के नाम पर पर्यटन विभाग जो कुछ करता है वह बाज़ार की ताकतों के जरिए इवेंट प्रबंधन से अधिक कुछ नहीं होता। मंचों पर व प्रदर्शनियों में प्रशासनिक अधिकारियों के मरजीदानों के लटकों-झटकों को ही राजस्थानी कला और संस्कृति मान  लिया जाता है। इसी का विद्रूप उदाहरण राजस्थानी भाषा में फिल्म निर्माण प्रोत्साहन एवं अनुदान की इस नीति में भी मिलता है। अनुदान देने के लिए इस नीति में एक फिल्म परीक्षण समिति की व्यवस्था है जो अनुदान के लिए फ़िल्मों का चयन करेगी। कला एवं संस्कृति विभाग के मंत्री की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय इस चयन समिति में सिर्फ़ दो गैर सरकारी सदस्य होंगे। नई नीति यह भी कहती है कि राजस्थानी फिल्म निर्माण के विभिन्न विभागों से जुड़े विशेषज्ञों का पैनल अलग से तैयार किया जायेगा तथा जरूरत के मुताबिक पैनल के विशेषज्ञ को फिल्म परीक्षण के लिए बुलाया जायेगा।
अब कोई पूछे कि जब राज्य में फिल्म निर्माण की कोई जमीन ही नहीं है तो विशेषज्ञ कहां से आएंगे। नीति का सारा जोर गुणवत्ता वाली राजस्थानी फ़िल्मों पर है और उनकी गुणवत्ता का निर्णय प्रशासनिक अधिकारियों की बहुमत वाली समिति करेगी। सब जानते हैं कि प्रशासन में पहुंच चलती है। नीति कहती है कि सिनेमाघर में फ़िल्म चलनी चाहिये। मगर सिने व्यवसाय वाले कहते हैं कि आज हालत यह है कि राजस्थानी फ़िल्मों को प्रदर्शन के लिए सिनेमाघर नहीं मिलते। सिनेमाघर चलाने वाले कहते हैं कि उन्हें चलाने के जितने खर्चे हैं राजस्थानी फ़िल्में उतनी कमाई नहीं देती। नई नीति में इस प्रमुख समस्या का जिक्र ही नहीं है। सरकार को पिछले काफी समय से यह सुझाव दिया जाता रहा है कि राज्य के प्रत्येक सिनेमाघर को प्रतिवर्ष कुछ निश्चित शो राजस्थानी फ़िल्में प्रदर्शित करने की वैसी कानूनी बाध्यता की जाय जैसी महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों में है। केरल में तो सरकार के अपने सिनेमाघर भी हैं जहां केवल वहां की क्षेत्रीय भाषाओं की फ़िल्मों का प्रदर्शन किया जाता है। और देखें, नीति की शर्तें कहती है कि फिल्म 2-के में या 35 एमएम फॉर्मेट में होनी चाहिये। इस नीति को बनाने वालों को कोई बताये कि 35 एमएम फॉर्मेट तो इस डिजिटल युग में कोई अस्तित्व ही नहीं है। चलचित्र अब सेल्यूलॉयड पर नहीं बनते। सारी फिल्में डिजिटल फॉर्मेट में ही बनती है। साथ में नीति शर्त लगाती है कि फिल्म 2-के में बने तभी अनुदान के योग्य होगी। तो आज की तारीख में राजस्थान में इसके सिनेमाघर ही गिने चुने हैं। 
ड़े मल्टीप्लेक्स के अलावा तो   2-के प्रदर्शन की क्षमता वाले सिनेमाघर है ही नहीं। एक अनोखा पैरा इस नीति में राजस्थानी भाषा की फिल्म को राज्य की जीएसटी की छूट का है। टैक्स मुक्त होने से टिकट दर कम हो जाती है जिससे अधिक दर्शकों के आने को प्रोत्साहन मिलता है। यह नीति कहती है कि यह सुविधा लेने के लिए सिनेमाघर के टिकट के खरीददार से तो जीएसटी की राशि नहीं ली जायेगी मगर फिल्म निर्माता को टैक्स की छूट का लाभ लेने के लिए उतनी राशि सरकार को पहले सरकार में जमा करानी पड़ेगी जो बाद में उसे वापस लौटा दी जायेगी। जिस निर्माता के पास अपनी फिल्म सिनेमाघर में लगाने के पैसे नहीं है वह कैसे एडवांस राशि जमा करा सकेगा यह तो नीति बनाने वाले प्रशासनिक अधिकारी ही जाने।नीति का एक और अंतर्विरोध देखें कि फ़िल्म पर्यटन नीति में तो डॉक्युमेंट्री फिल्म का जिक्र है मगर उसी के दूसरे भाग राजस्थानी फिल्म प्रोत्साहन नीति में उसका जिक्र नहीं है। डॉक्युमेंट्री फ़िल्मों पर बड़ा खर्च नहीं आता इसलिए इस नीति के पहले भाग के अनुसार दो करोड़ रुपयों के खर्च नहीं होने से वे फिल्म पर्यटन प्रोत्साहन लाभ से वंचित रह जायेगी। राजस्थानी भाषा की फ़िल्मों के अनुदान वाले दूसरे भाग में तो उनको शामिल ही नहीं किया गया है। इसी प्रकार राजस्थानी शॉर्ट फिल्मों के लिए भी इस नीति में कोई जगह नहीं है। फिल्म पर्यटन नीति कहती है कि इसका लाभ उन फ़िल्मों को मिलेगा जिनकी कुल निर्माण लागत में से दो करोड़ रुपये राजस्थान में खर्च हों।
राजस्थानी फिल्में बनाने वाला तो बड़ी मुश्किल से करीब 50 लाख में फिल्म बना पाता है। जब प्रदेश में राजस्थानी भाषा और संस्कृति का ही कोई धणी-धोरी न हो तब राजस्थानी फ़िल्मों को खाद पानी कहां से मिले। देश में जहां क्षेत्रीय फिल्में अपना ऊंचा रुतबा बनाये हुए हैं वे वो प्रदेश हैं जहां स्कूलों में उनकी भाषा पढ़ाई जाती है। हमारे यहां अंग्रेजी माध्यम की स्कूलें खोली जाती है लेकिन प्रदेश के लोगों की मातृभाषा की बात करने वाला पिछड़ा माना जाता है। शासन में कला-संस्कृति का नाम सिर्फ़ ब्रांडिंग और माल बेचने के लिए लिया जाता है। ऐसे में राजस्थानी सिनेमा दिखाने का या उसके प्रोमोशन के किसी चैनल की तो कल्पना करना ही दूर की बात है। जरूरत है कि ऐसी नीतियां सिनेमा को समझने वाले लोगों को सक्रिय रूप से साथ लेकर बनाई जाय। कोई ऐसी व्यवस्था हो जिसमें निर्माता, निर्देशक, कलाकार, तकनीकी लोग, वितरक और प्रदर्शक आदि फैसला करें और नौकरशाह का काम सिर्फ़ उनके निर्णयों की पालना और उनके क्रियान्वयन का हो। यह मुद्दा सभी हितधारकों के बीच गंभीर संवाद की अपेक्षा रखता है। यह गंभीर संवाद करवाने की शासन की जिम्मेवारी बनती है। किसी ने पूछा है कि क्या कभी कोई राजस्थानी फिल्म ‘बाहुबली’ या ‘आरआरआर’ जैसी धूम मचा सकती है? नई नीति से तो ऐसी कल्पना करना बेमानी है।

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