फेफड़े का कैंसर : एक दूसरा दृष्टिकोण - डॉ. रामावतार शर्मा


फेफड़े का कैंसर सबसे ज्यादा पाया जाने वाला कैंसर है जिसने कि अब गले के कैंसर को भी मात दे दी है। यह मानना कि फेफड़े का कैंसर सिर्फ तंबाकू पीने वालों को ही होता है आंशिक रूप में ही सच है। भारत में कोई 50 प्रतिशत फेफड़े का कैंसर उन लोगों में पाया जाता है जिन्होंने कभी भी तंबाकू का सेवन नहीं किया। यह रोग भारत के तंबाकू से परहेज करने वाले लोगों में मृत्यु का दस नंबर पर आने वाला कारण है। चूंकि तंबाकू नहीं पीने वालों पर शक कम किया जाता है तो उन लोगों में बीमारी का पता ज्यादा देर से लगता है इसलिए ऐसे लोगों में मृत्यु दर ज्यादा होती है। बिना तंबाकू सेवन समूह में यह बीमारी महिलाओं में ज्यादा पाई जाती है, करीब दो तिहाई मामले महिलाओं में होते हैं। जिन महिलाओं में डायबिटीज होती है या जिनकी कमर मोटी होती है उनमें फेफड़े का कैंसर ज्यादा होता है।

     महिलाओं में इस कैंसर के ज्यादा होने का कारण भारतीय रसोई में तेल का छौंक लगाना माना जाता है। इसके अलावा भारतीय महिलाएं रसोई में भोजन को तलने का कार्य लंबे समय तक करती हैं। तेल की भाप फेफड़ों में जा कर कैंसर कर सकती है। इसके अलावा भारत में फैक्टरीज तथा वाहनों का धुआं भी एक बड़ा कारण रहा है हालांकि अब यह तुलनात्मक रूप से कम हो गया है।

     एक गैस होती है जिसका नाम है रेडॉन गैस जो कि सामान्यतः तो नुकसान नहीं करती पर यदि जमीन में यूरेनियम अधिक हो जाए तो यह गैस जहरीली हो जाती है। पंजाब में फेफड़े के कैंसर का यह एक महत्वपूर्ण कारण है।

     केमिकल उत्पादन उद्योग से जुड़े लोग भी खतरे में रहते हैं।

     पति के सिगरेट या बीड़ी के धुएं से पत्नी या बच्चों को कैंसर हो सकता है। इसको निष्क्रिय तंबाखू सेवन कहते हैं।

     इस नए दृष्टिकोण को उजागर करने का उद्येश्य यह था कि हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि यदि हम तंबाकू का सेवन नहीं करते तो फेफड़े के कैंसर के विरुद्ध हमारा बीमा हो गया है। जीवन सदा ही अप्रत्याशित घटनाओं से भरा हुआ मार्ग है।

     जीना कब तक मुहाल होगा

     आखिर  एक दिन विसाल होगा ।।

         ( ए जी जोश )

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