चितौड़गढ़ में मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना की उड़ती धज्जियां, योजना के प्रभारियो ने ही लगाया पलीता।

चित्तौड़गढ़-गोपाल चतुर्वेदी।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मंशा के अनुरूप निरोगी राजस्थान का सपना साकार करने के लिए सभी राजकीय चिकित्सालय में मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना की शुरुआत वर्ष 2011 में की गई थी। जिससे प्रत्येक व्यक्ति को सभी दवाए निशुल्क उपलब्ध करवाई जा रही है। वहीं चित्तौड़गढ़ जिले के सबसे बड़े जिला राजकीय सांवलियाजी चिकित्सालय की बात की जाए तो वहां पर मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना के प्रभारी और स्टोर कीपर इस योजनाओं को पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
जिसमें दवाइयों की कमी होने के बाद राज्य सरकार के आदेशानुसार आर एम आर एस योजना अंतर्गत स्थानीय स्तर पर दवाइयों की खरीद की जा रही है और वह दवाएं आमजन को नहीं मिल कर कर्मचारियों की आपसी मिलीभगत से बाजार में बिकने के लिए उपलब्ध कराई जा रही है।
मामला चित्तौड़गढ़ जिले के सबसे बड़े जिला राजकीय श्री सांवलियाजी चिकित्सालय का है। जहां पर मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना के अंतर्गत स्थानीय स्तर पर
आर एम आर एस से कई दवाओं की खरीद की जा रही है। जिस पर स्टोर प्रभारियों की लापरवाही से स्थानीय स्तर पर खरीदी जा रही अंकित मूल्य की दवाओं पर बिना नॉट फॉर सेल और निशुल्क दवा योजना की छाप लगाए बिना निशुल्क दवा काउंटर पर पहुंच रही है।
जिस पर दवा काउंटर प्रभारियों का डाका स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है और यह दवाएं आमजन को उपलब्ध करवाने की बजाय सीधी बाजार मे संचालित हो रहे मेडिकल की दुकानों तक पहुंच रही है। जब इसके बारे में संवाददाता गोपाल चतुर्वेदी ने पड़ताल की तो सामने यह आया कि इस पूरे खेल में स्टोर प्रभारियों से लेकर डीडीसी प्रभारियों की भूमिका सामने आई है जो कि इस बड़े खेल को अंजाम दे रहे हैं और जब संवाददाता ने जिला कलेक्टर अरविंद कुमार पोसवाल से इस बारे में बात करने की तो उन्होंने इस मामले को गंभीर बताते हुए पीएमओ डॉ दिनेश वैष्णव को इसकी जांच करवाने के लिए निर्देशित किया।
लेकिन अभी तक इस पर दवाओं पर डाके के खेल मे जांच का कोई नतीजा सामने नहीं आया है। जानकारी में सामने आया है कि इस खेल के जो मुख्य दोषी है वह अब जो ईमानदारी के साथ काम कर रहे हैं वह उन्हें धमकाने के लिए सामने आने लगे हैं। जानकारी में यह भी सामने आया है कि चित्तौड़गढ़ जिला चिकित्सालय में इन दिनों फार्मासिस्ट की कमी देखी जा रही है और निशुल्क दवा काउंटर हेल्पर के भरोसे संचालित किए जा रहे हैं।वर्तमान में चिकित्सालय प्रशासन ने दो फार्मासिस्ट भरत धाकड़ और परमिंदर सिंह को स्टोर का चार्ज दे रखा है और दूसरी और जिला चिकित्सालय फार्मासिस्ट की कमी से जूझ रहा है। अब देखना यह है कि आमजन को मुख्यमंत्री निशुल्क दवाई योजना के अंतर्गत खरीदी जा रही दवा पर डाका डालने वाले इन कर्मचारियों पर प्रशासन क्या कार्यवाही करता है या फिर इस मामले को भी दूसरे मामलों की तरह ठंडे बस्ते में डाल कर इतिश्री कर ली जाएगी। यह तो आने वाला समय ही बताएगा। वर्तमान में इस पूरे खेल को देखकर तो यही लगता है कि बिल्ली को दूध की रखवाली के लिए रखा गया है जो कि खुद तो दूध पी सकती है लेकिन दूसरों को दूध पीने से रोकने का काम कर रही है और कुछ दूध जो बचता है वह दूसरों तक पहुंचाने का काम कर रही है।

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