सामूहिक बलात्कार के अभियुक्त का प्रसंज्ञान, आदेश को हाईकोर्ट ने किया अपास्त।

जयपुर ब्यूरो रिपोर्ट।
राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीपति वीरेन्द्र कुमार की पीठ ने योगेश कुमार शर्मा व अन्य की किमिनल मिस याचिका को स्वीकार करते हुये याचीगण को सामूहिक बलात्कार के प्रसंज्ञान के आदेश को अपास्त करते हुये याचिका स्वीकार करने का निर्णय दिया। न्यायालय न्यायिक मजिस्ट्रेट, विराटनगर, जिला जयपुर द्वारा अपने आदेश दिनांक 11.07.2022 को योगेश कुमार शर्मा के विरूद्ध 376 आई.पी.सी. व गोपेश के खिलाफ धारा 376 डी आई.पी.सी. में प्रसंज्ञान लिया जाकर अभियुक्त को गिरफ्तारी वारंट से तलब किये जाने का आदेश दिया गया। याचीगण ने उक्त निर्णय के खिलाफ राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर के समक्ष अधिवक्ता मामराज जाट के जरिये किमिनल मिस याचिका दायर की। पीडित के एडवोकेट ने बताया कि "दिनांक 29.06.2018 को पीडिता के भाई ने एक प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस थाना विराटनगर, जिला जयपुर ग्रामीण में अपहरण की दर्ज करवाई। पीड़िता ने अभियुक्त योगेश कुमार शर्मा से आर्य समाज मन्दिर में शादी कर ली और राजस्थान उच्च न्यायालय में दोनो ने याचिका प्रस्तुत कर परिजनों से सुरक्षा प्राप्त करने का आदेश पारित करवाया। इसके बाद पीडिता अपने घरवालों के साथ चली गयी।अनुसंधान के बाद अनुसंधान अधिकारी ने एफ आर अदम वकू गलतफहमी में दर्ज करवायी गई। इस घटना के बाद पीडिता ने अभियुक्त योगेश व अन्य के खिलाफ सामूहिक बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवायी गयी। जिसमें पीडिता ने अभियुक्तगण पर अश्लील विडियों बनाकर डरा धमकाकर कर बलात्कार करने का आरोप लगाया। अनसुधान अधिकारी ने अपने अनुसंधान के बाद अदम वकू झूठ में रिपोर्ट संबंधित न्यायालय में प्रस्तुत की गई। उक्त एफ. आर. के खिलाफ पीडिता ने प्रोटेस्ट याचिका न्यायिक मजिस्ट्रेट विराट नगर, जिला जयपुर में प्रस्तुत की जिसमें न्यायालय द्वारा दिनांक 11.07.2022 को अभियुक्तगण के विरुद्ध सामूहिक बलात्कार का मामला मानते हुये प्रसंज्ञान लेते हुये गिरफ्तारी वारंट जारी किये गये। "पीठ के समक्ष याचीगण की ओर से अधिवक्ता हेमन्त गजराज व मामराज जाट द्वारा न्यायालय के समक्ष पैरवी की गई कि पीडिता ने राजस्थान उच्च न्यायालय के समक्ष दो बाद उपस्थित हुई लेकिन याचीगण के द्वारा बलात्कार करने का आरोप नहीं लगाया गया। पीठ के समक्ष अधिवक्ता मामराज द्वारा बताया गया कि याचीगण के द्वारा पहली रिपोर्ट से लगभग 8 महिने पहले बलात्कार करने का आरोप लगाया गया तथा न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पहले अपने बयानों में भी बलात्कार आदि का आरोप नहीं लगाया गया। बाद में पीडिता अपने घरवालों के पास जाने के बाद सोची समझी साजिश के तहत याचीगण पर बलात्कार का आरोप लगाया गया जिस पर न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा प्रसंज्ञान आदेश पारित किया गया। पीठ के न्यायाधीश विरेन्द्र कुमार के समक्ष याचीगण के अधिवक्ता मामराज जाट द्वारा तर्क दिया गया कि अनुसंधान के दौरान चिकित्सकीय रिपोर्ट में पीडिता के शरीर पर चोटें अथवा बलात्तसंग के निशान नहीं पाए गए है जिसके कारण प्रसंज्ञान आदेश खारिज किये जाने योग्य है। अधिवक्ता मामराज जाट ने बताया कि पीडिता राजस्थान उच्च न्यायालय के समक्ष 06.07.2018 को योगेश के साथ अपनी इच्छा से शादी करने का कथन किया है तथा अपने परिवार से संरक्षण प्रदान करने का निवेदन भी उच्च न्यायालय से किया था। जिसके कारण न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित प्रसंज्ञान आदेश खारिज किये जाने योग्य है। पीठ ने याचीगण के अधिवक्ता मामराज जाट के तर्कों से सहमत होते हुए याचीगण के विरूद्ध धारा 376, 376डी के न्यायिक मजिस्ट्रेट, विराटनगर के प्रसंज्ञान आदेश को अपास्त करते हुये उक्त याचिका स्वीकार करने का निर्णय पारित किया है।

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