उफनते खोलते पर्वतों की भूमि - डॉ. रामावतार शर्मा

बात 1934 की है जब एक बहादुर व्यक्ति ने धरती पर एक ऐसी यात्रा करने का इरादा बनाया जो एक तरह से  चांद पर जाने जैसा ही था। जिस जगह वह जा रहा था वहां उसके पहले जाने वाले छह दलों का एक भी सदस्य लौट कर नहीं आया था, वे या तो मर गए या फिर सफेद कपड़ों में लिपटे सामान्य मानव सभ्यता से कटे आदिवासी लोगों द्वारा मार दिए गए। ब्रिटेन के इस नागरिक का नाम था लुडोविको नेसबिट्ट। उसको पता था कि यह यात्रा पैदल ही होगी या कभी कभी ऊंटों की पीठ पर। जहां वह जा रहा था वहां का दिन का तापमान 75 डिग्री सेल्सियस होगा, पानी सिर्फ एक या दो जगह भाग्य से ही मिलेगा, उसके कुछ ऊंट मर जायेंगे  और श्वेत प्रेतों जैसे आदिवासी अचानक हमला कर उसे और अन्य सदस्यों को मार सकते हैं। संख्या में नगण्य से ये आदिवासी अति खूंखार होते हैं। पर नेसबिट्ट ने ठान लिया तो बस ठान लिया था।

नेसबिट्ट, उसके दो इटालियन साथी और एक अफ्रीकन मार्गदर्शक ने यह अति खतरनाक यात्रा प्रारंभ की। यात्रा ज्यादातर रात में ही होती थी फिर भी धरती की गर्मी से मोटे जूतों के बावजूद उनके पांव झुलस जाते थे, चमड़ी राख से काली और सुखी हो गई, होठ फट गए, एक दो ऊंट मर गए और एक दिन पानी भी समाप्त हो गया। जब लगने लगा कि प्यास के कारण मृत्यु अति निकट है उन्हे एक पानी का कुंआ मिल गया जिसके फलस्वरूप हम यह यात्रा वृतांत पढ़ लिख रहे हैं।

     इस अभियान दल की मंजिल थी इथियोपिया और एरिट्रिया के मध्य स्थित पांच विशाल ज्वालामुखियों का समूह जिनमें सबसे विशाल का नाम था एर्टा एल। धरती का यह स्थान आतंक की जमीन, मृत्यु और कष्ट की धरती कहलाता है जो कि दानाकिल दबाव का हिस्सा है, सागर के तल से भी नीचा है। तेज गर्मी से यहां का पानी पूर्णतया वाष्पित हो जाने से कोई तीन किलोमीटर मोटी नमक की परत जमी पड़ी है क्योंकि यह क्षैत्र कभी लाल सागर का हिस्सा था।

     यहां रहने वाले गिने चुने दानाकिल आदिवासी भेड़ पालते हैं और पूर्णतया घुम्मकड़ होते हैं। भेड़ के दूध और मांस पर पूरा जीवन निकालते हैं। बड़े खतरे उठा कर ये लोग नमक इकट्ठा कर बेचते हैं पर इस प्रयास में कितने ही गर्मी से मर भी जाते हैं पर सारे खतरों के बावजूद यहीं रहना चाहते है, यहीं जीना यहीं मरना।

 

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