तुरकाना झील: जिस पर नदी चलती है - डॉ. रामावतार शर्मा

इथियोपिया से एक नदी का उद्गम होता है जो कोई 640 किलोमीटर चल कर उत्तरी केनिया में अपनी यात्रा समाप्त करती है। अपने इस रास्ते में यह नदी कई नाटकीय पतले मोड़ों से गुजरती है जिसके फलस्वरूप कई झरने भी बनते हैं। इस नदी का आखिरी पड़ाव अनूठा है। जहां नदी समाप्त होती है वहां एक विशाल झील है जिसमें पानी के साथ साथ कीचड़ और तलछट ( सेडीमेंट ) भी जमा हुआ है। ऊपर से ज्वालामुखी की राख एक मोटी परत बना देती है। इस पर जब नदी का पानी गिरता है तो एक राजमार्ग सा बन जाता है। नदी का यह पानी झील की राख पर किसी बाज के विशाल पंजे को तरह फैल जाता है। देखने में यह सब रोमांच पैदा करता है। ऐसा लगता मानो किसी इंजीनियर ने बड़े जतन से मार्ग बनाया है। ज्वालामुखी के लावा की राख में बड़ी मात्रा में धोवन सोडा ( वाशिंग सोडा ) इस झील के पानी में मिला हुआ होता है।

 उत्तर पश्चिम केनिया का यह हिस्सा पूर्णतः बंजर है इसमें बिरले लोग ही यात्रा कर पाते हैं। इस झील में विशालकाय मगरमच्छ रहते हैं पर वे मनुष्य पर हमला नहीं करते क्योंकि इस झील में बड़ी संख्या में नाइल पर्च नामक 90 किलो वजन वाली मछलियां भी होती हैं। मछलियों का शिकार कर मगरमच्छ अलाश्य के मारे पसरे रहते हैं जिनकी संख्या कोई 1200 से ज्यादा की है। सोडे के संपर्क से इनकी चमड़ी खुरदरी और भद्दी सी होने से आदमी इन मगरमच्छों का शिकार नहीं करता है। इस झील में मगर कोई दस लाख साल से भी अधिक समय से रह रहे है। मगरों के अलावा तुरकाना झील में कुछ पक्षी व हिप्पो भी रहते हैं। झील के आसपास के क्षैत्र में तकरीबन 20 लाख साल पुराने दो पैरों पर चलने वाले जीवों के निशान भी पाए गए हैं जो लगता हैं कि आधुनिक मनुष्य के पूर्वज रहे होंगे।    

 

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