ईद मिलादुन्नबी की तमाम कायनत को दिल से मुबारकबाद।

पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम का आख़री ख़ुतबा (संदेश)
“मैं जो कुछ कहूँ, ध्यान से सुनो! इंसानों तुम्हारा रब एक है, अल्लाह की किताब और उसके रसूल सल्ललाहु अलैही वसल्लम की सुन्नत को मज़बूती से पकड़े रखना...।

लोगों की जान-माल और इज़्ज़त का ख़्याल रखना, न तुम लोगों पर ज़ुल्म करो, न क़यामत में तुम्हारे साथ ज़ुल्म किया जाएगा...। कोई अमानत रखे तो उसमें ख़यानत न करना...। ब्याज़ के क़रीब न भटकना...।

किसी अरबी को किसी अज़मी (ग़ैर-अरबी) पर कोई बरतरी हासिल नहीं, न किसी अज़मी को किसी अरबी पर, न गोरे को काले पर, न काले को गोरे पर फ़ज़ीलत अगर किसी को है तो सिर्फ़ तक़वा व परहेज़गारी से है...। रंग, जाति, नसल, देश, इलाके किसी के लिए बरतरी की बुनियाद नहीं हैं...। बरतरी की बुनियाद अगर कोई है तो ईमान और उसका तक़वा है...। जो कुछ ख़ुद खाओ, अपने ग़ुलामों को भी वही खिलाओ और जो ख़ुद पहनो, वही उनको पहनाओ...।

इस्लाम आने से पहले के सभी ख़ून (हत्या) ख़त्म कर दिए गए, अब किसी को किसी से पुराने ख़ून (हत्या) का बदला लेने का हक़ नहीं, और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान का ख़ून, रबिया इब्ने हारिस का ख़ून, ख़त्म करता हूँ (यानी उनके क़ातिलों को माफ़ करता हूँ)...।

पिछले दौर के सभी ब्याज़ (सूद) ख़त्म किये जाते हैं और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान में से अब्बास इब्ने मुत्तलिब का ब्याज़ ख़त्म करता हूँ...।

औरतों के मामले में अल्लाह से डरो, तुम्हारा औरतों पर और औरतों का तुम पर हक़ है... औरतों के मामले में तुम्हें वसीयत करता हूँ कि उनके साथ भलाई का रवैया अपनाओ...।

लोगों! याद रखो, मेरे बाद कोई नबी नहीं और तुम्हारे बाद कोई उम्मत नहीं है... अपने रब की इबादत करना...। रोज़ाना पंचों वक़्त की नमाज़ पढना, रमज़ान के रोज़े रखना, ख़ुशी-ख़ुशी अपने माल की जक़ात अदा करना...। अपने रब के घर का हज करना और अपने हकीमों का कहना मानना...। ऐसा करोगे तो अपने रब की जन्नत में दाख़िल होगे...।

लोगों क्या मैंने तुम तक अल्लाह का पैग़ाम पहुंचा दिया...?
लोगों की भारी भीड़ बोल उठी: हाँ, ए अल्लाह के रसूल ﷺ
तब मुहम्मद ﷺ ने तीन बार कहा, ए अल्लाह तू गवाह रहेगा...।
उसके बाद कुरान की यह आयत सुनाई...

"आज मैंने तुम्हारे लिए दीन को पूरा कर दिया और तुम पर अपनी नियामत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए दीने इस्लाम को पसंद किया...।"
(कुरान: सुरह मायदा, आयत न 3)”
(सहीह बुखारी, हदीस, 1623, 1626, 6361)

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