मोहम्मद इरफ़ान से साभार - सिर्फ़ मज़े के लिए देखी जाने वाली फ़िल्में सज़ा देती हैं |

 


डॉक्टर मोहन अगाशे एक कुशल अभिनेता हैं और साथ ही साथ मनोचिकित्सक भी. पूना में रहते हैं. 71 साल की उम्र है. फिल्मों के अलावा नाटकों में आज भी जमकर सक्रिय रहते हैं.पूना के प्रभात रोड पर एक रेस्त्रां में उनसे मुलाक़ात हो गयी तो फिल्मों के फंक्शन और मनोविज्ञान पर चर्चा चल निकली. बोले –

हम लोगों के यहां फिल्म की चर्चा जब भी आई वह केवल मनोरंजन के रूप में ही आई. तो हमारा नज़रिया ये हो गया है कि फिल्म देखने जाते हैं तो सिर्फ मनोरंजन के लिए जाते हैं. बहुत सारे लोग, जिनमें पढ़े-लिखे भी उतने ही शामिल हैं, कहते हैं ‘मैं जब फिल्म देखने जाता हूँ तो सब (दिमाग़ विमाग़) घर पर रखकर जाता हूँ.

लेकिन क्या आपको यह अहसास नहीं होता कि यह बात बहुत बहुत महत्वपूर्ण है, चाहे आप चाहें या न चाहें, कि आप जिन फिल्मों को देखते हैं वे आपको सूचनाओं से भरती हैं – सीधे आपके अवचेतन और अचेतन को. फिल्म के माध्यम को छोड़ कर ऐसा कोई अन्य माध्यम नहीं जो सीधा आपके अवचेतन तक पहुंचता है, क्योंकि वह छवि और ध्वनि के लिहाज़ से बहुत मज़बूत होता है.

मैं इस वक्त आपसे बात कर रहा हूँ तो शब्द तो आप सुन रहे हैं लेकिन आप देख भी रहे हैं कि मैं कैसे बोल रहा हूँ, इस बात को शरीर के विभिन्न हिस्सों द्वारा प्रोसेस किया जाता है.

तो फिल्म की छवि और ध्वनि के माध्यम से सूचना आपके अवचेतन में जाती है और आप चीज़ों के बारे में अपना विचार बनाते हैं.

पढ़े लिखे हैं हम. लेकिन बहुत कम चीजें पढ़ते हैं. पढ़ने लिखने की हमारी आदत ही नहीं है लेकिन दुनिया की हर चीज़ के बारे में हमारे पास विचार होते हैं. तो ये विचार विचार कहाँ से आता है? एक अपनी जिंदगी के अनुभव होते हैं और जिंदगी के सबसे नजदीक अनुभव फ़िल्में देती हैं हमें.

तो पैसिव जानकारी के खतरे पैसिव धूम्रपान से भी बदतर हैं. और क्योंकि फिल्म को फ़क़त मनोरंजन समझा जाता रहा है और इन्हें वही लोग बनाते थे जिनकी यह फैकल्टी यानी मनोरंजन की फैकल्टी मजबूत थी. तो वो मनोरंजन के लिए सिर्फ मसाला भरते थे. हमारा कमर्शियल मेनस्ट्रीम सिनेमा सिर्फ मसाला है. मैं जो सिनेमा करता हूँ मैं उसे पौष्टिक मनोरंजन कहता हूं. यह एक उच्च प्रोटीन वाला मनोरंजन है जो सेहत के लिए भी अच्छा है और मन के लिए भी. इसलिए हम ऐसी फ़िल्में बनाते हैं. लेकिन फिल्म बनाना एक अलग चीज है. दिखाना दूसरे लोगों के हाथ में है. इसीलिए आजकल देखिये टेलीवविजन इंडस्ट्री मनोरंजन करने वालों के प्रभुत्व में नहीं है, यह बिजनेसमैन द्वारा डामिनेटेड है. शिक्षा भी बिजनेसमैन द्वारा डामिनेटेड है. शिक्षा देने वाले के हाथ में शिक्षा है ही नहीं.

आज विजय तेंदुलकर होते तो उन जैसे लोगों को ये टेलीविजन के कुछ बिजनेस मैनेजमेंट वाले लोग बताते कि किस तरह से इसको लिखो तुम. इस करेक्टर को बढ़ाओ, उसको मार दो, इसको हटाओ अब. तो धंधा करना अलग चीज है.

तो अच्छी फिल्म कौन सी है मेरे लिए?

जब आप फिल्म देखते है तो पता नहीं चलता. फिल्म ख़तम होने के बाद दिमाग से जाती नहीं और फिर से शुरू होती है जब दूसरी चीजों का ख़याल दिमाग़ में आकर बैठ जाता है. तो फिल्म आपको रोकती नहीं. फिल्म ख़त्म होती है और विषय आपके दिमाग में शुरू हो जाता है. फिल्म समाप्त होती है और आप थियेटर के बाहर निकलते हैं. फिल्म का विषय आपके दिमाग में घूमने लगता है. फिल्म में उठायी गई समस्या आपके दिमाग में शुरू हो जाती है.

एक अच्छी फिल्म या अच्छे लेखन का काम सही प्रश्न उठाना है. कारण यह है कि सवाल समान हैं लेकिन उत्तर अलग-अलग हैं. ज़रूरतें एक ही हैं हमारी.

खाना : भूख लगी है! खाना एक ज़रूरत है. आपको अलग चीज अच्छी लगती है, मुझे अलग चीज अच्छी लगती है. इसलिये सही सवाल उठाना सही चीज है. इसे कैसे हल करें आपकी समस्या है. मैं यहां इसका समाधान करने के लिये नहीं हूँ.

यही वह है जिसे लैग्ज़ेटिव कहते हैं. जो आपको झूठे उत्तर देता है. सपनों का काम नींद को सुरक्षित रखना है. भारतीय मेनस्ट्रीम सिनेमा का काम हमारी सामाजिक नींद को बनाए रखना है ताकि वो जो झोपड़पट्टियों में रहते हैं मेनस्ट्रीम फिल्म देखते हैं उनकी सारी मनोकामनाएं वहीं पूरी होती हैं और वो कभी दुनिया को बदलने की जरुरत महसूस नहीं करते, वे अपने दुखों के साथ ही जीते रहते हैं. तो धर्म की तरह शुद्ध मनोरंजन सिनेमा अफीम है. ये मेरा अनुभव सिद्ध कहना है.”



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