जब रक्त पर उम्र हावी होती है - डॉ रामावतार शर्मा

जब हमारी उम्र बढ़ती है तो हमारी रक्त बनाने की प्रक्रिया, जो हमारे जन्म के साथ प्रारंभ होती है, पर भी उम्र का प्रभाव पड़ने लगता है। पचास वर्ष की उम्र के पार हमें कुछ ऐसे रक्त संबंधित रोग हो सकते हैं जिनकी जानकारी और इलाज अधितर सामान्य चिकित्सकों के पास नहीं होता है, निदान भी आसान नहीं होता और निदान तथा इलाज दोनों महंगे होते हैं क्योंकि अधिकतर बीमारों को हेमेटोजिस्ट फिजिशियन के पास जाना पड़ता है जो आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं। इन बीमारियों में हमारी विभिन्न रक्त कणिकाओं पर प्रभाव पड़ता है जिन्हे मायलो डिस्प्लास्टिक सिंड्रोम ( एम डी एस ) कहा जाता है।

     इस तरह के रोगों से पीड़ित व्यक्ति में रक्त की कमी, बार बार संक्रमण या रक्त स्राव होते हैं। कभी कभी रक्त कैंसर भी हो जाता है। निदान और उपचार के अभाव में डायबिटीज और हार्ट अटैक भी हो सकते हैं। भारत में बुजुर्गों की संख्या में वृद्धि हो रही है तो इस तरह की बीमारियों के प्रति जागरूकता की आवश्यकता है।

     हमारे शरीर की कुछ हड्डियों के विशेष भागों में वसायुक्त मुलायम टिश्यू होते हैं जिन्हे बोन मैरो कहा जाता है। इस मैरो में रक्त कोशिकाएं बनती जो परिपक्व हो कर अपने कार्य करती हैं। एम डी एस में यह परिपक्व होने की क्रिया बाधित होती है। रक्त कणिकाओं की कमी के कारण सांस फूलना, थकान, पीलापन, बार बार बीमार होना, नाक, आंख या त्वचा में रक्त निकलना आदि लक्षण नजर आने लगते हैं। इन बीमारियों का इलाज विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा ही किया जाता है।

 

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