शंकरा : परिवर्तन की लहर जो उठी और गिर पड़ी - डॉ. रामावतार शर्मा

 

वह एक अद्वितीय व्यक्तित्व के स्वामी थे पर उनके बारे में हम जो कुछ भी जानते हैं वह लोक कहानियों और फिर बाद में लिखी जीवन कथाओं से ही प्रेरित है। कहते हैं वह कलाडी में एक नंपुदिरी ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे पर इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है और इसके अलावा भी कई और अवधारणाएँ मौजूद हैं । एक दंतकथा के अनुसार वे सिर्फ़ अपनी माँ की अंतिम क्रिया के लिए अपने जन्म घर आए थे जिसका कि मीनांसकों ( टीकाकार ) नें कड़ा विरोध किया था। एक और दंत कथा के अनुसार 32 वर्ष की उम्र में बद्रीनाथ में उनका देहांत हो गया था। इस चर्चित व्यक्तित्व का नाम रहा है शंकर या शंकराचार्य ।

  केरला के नंपुदिरी ब्राह्मण समाज में आचार्य-ब्रह्मचार्य परंपरा बहुत पुरानी रही है। यह व्यवस्था उपनिषद ज्ञान एवंम शिक्षा पर आधारित थी और कुछ ही नंपुदिरी परिवार इसमें दिक्षा लेते थे। शंकर के गुरू श्री गोविंदपाद थे। ऐसा भी माना जाता है उस समय उपनिषद ज्ञानियों  की जगह मीमांसक लेने लगे थे और वे लोग नौंवी सदी में मंदिरों पर केंद्रित हो कर ज़मीनों को अधिकार में करने के लिए उपयोग में लिए जाने लगे थे। इसको देखते हुए ऐसा लगता है कि शंकरा सदी 700-750 सी ई के बीच में रहे हैं और उन्होंने  ज़्यादातर काँची में वास किया जहां पर उनके ज्ञान और तर्क के सामने साधारण मीमांसक टिक नहीं पाते थे। शंकरा ने इच्छा जताई कि वह एक सन्यासी का जीवन व्यतीत करेंगे, सामाजिक बंधनों से मुक्त रहेंगे, कुछ भी वस्तु अपने पास नहीं रखेंगे, न ज़मीन जायदाद, न घर और न धन। उन्होंने तय किया कि वे जीवनपर्यंत भ्रमण करेंगे, भिक्षा पर जीवित रहेंगे, और जीवन या मृत्यु में कोई भेदभाव नहीं रखेंगे। एक तरह से शंकरा परोक्ष बौद्ध थे। इसी के तहत शंकर नें चार पीठों की स्थापना की - दक्षिण में श्रृंगेरी, पूरब में पुरी, पश्चिम में द्वारका और उत्तर में बद्रीनाथ ।

      शंकर के अनुसार वेद सामान्य जन के लिए दिशानिर्देश है और उपनिषद ज्ञानपिपासु की यात्रा है। उनके हिसाब से जीवन एक तरह से  आत्मा, धरती पर जीवन के अस्थायीपन, और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का मिलन है और इसी लिए उन्होंने बाहरी एवम् जो प्रदर्शित हो रहा है उस जीवन को माया यानि भ्रम कहा।

    शंकर एक अद्वितीय विश्वगुरु थे जिन्होंने अद्वैत वेदांत की नींव रखी। पर क्या शंकर धरती पर मौलिक परिवर्तन ला सके ? शायद नहीं। उस समय के सामाजिक सत्ता संघर्ष नें शंकरा को रोके रखा। तमिल भक्ति आंदोलन में शैव और वैष्णव भजन गायकों ने शंकर को उभरने नहीं दिया, बाद में रामानुज नें श्रिवैश्नव आंदोलन चलाया जो मंदिरों पर केन्द्रित था और फिर यही काम माधव नें किया। खुद शंकर के शिष्य भी कई संप्रदायों में विभक्त हो गये। धन और सत्ता ने शंकर द्वारा स्थापित पीठों को भ्रष्ट कर दिया।

    आज शंकर महज़ एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं जिन्होंने कर्मकाण्डी धर्म का विरोध कर एक दार्शनिक सोच को जन्म देने की कोशिश की पर इस ज्ञान रूपी शिशु का एक तरह से भ्रुणकाल में ही अंत हो गया।

 

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