मनसा,वाचा और कर्मणा से कार्य हो तो गैर बराबरी दूर होना संभव- डॉ.कुसुम।

जयपुर ब्यूरो रिपोर्ट।
वरिष्ठ भाषाविद और साहित्यकार डॉ नरेन्द्र शर्मा कुसुम ने कहा है कि विकास की अवधारणा में आम आदमी को जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति और समानता का अधिकार देने से ही विकास होगा। जहां तक गैर बराबरी का सवाल है तो यह एक श्रेष्ठ विचार है। इसमें बौद्धिक,शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक समानता की बात असंभव है। राजसत्ता मनसा,वाचा और कर्मणा से कार्य करे तो गैर बराबरी काफी हद तक कम हो सकती है। वे मुक्त मंच की 63 वीं वैचारिक संगोष्ठी में मुखी अतिथि के तौर पर बोल रहे थे। गोष्ठी कि अध्यक्षता करते हुए आईएएस (रि)और विचारक अरुण ओझा ने कहा कि गैर बराबरी सदियों से चली आ रही है और समय-समय पर इसका स्वरूप बदलता रहता है। 
नॉम चोमस्की को उद्धृत करते हुए उन्होने कहा कि लोकतन्त्र  भी एक प्रतिशत के लिए, एक प्रतिशत द्वारा और एक प्रतिशत के मध्य ही प्रवाहित होता है इसलिए गैर बराबरी कभी समाप्त नहीं हो पायी है ।महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज्य के सिद्धान्त से गांवों में उत्पादन और शहरों में उसके वितरण से ही गैर बराबरी दूर हो सकती है। गरीबी दूर करने के लिए प्रतीकात्मक कामों की बजाय ठोस कामों की जरूरत है और हर हाथ को काम मिलन चाहिए। मुक्त मंच के संयोजक और वरिष्ठ साहित्यकार श्रीक़ृष्ण शर्मा ने गैर बराबरी और विकास की अवधारणा विषय की विस्तार से व्याख्या करते हुए कहा कि संविधान में इसकी व्यवस्था को  भुला दिया गया है जिससे सारे संकट खड़े हो रहे हैं।राज्य डांग क्षेत्र विकास बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी (रि) डॉ सत्यनारायण सिंह ने कहा कि विकास का गलत निर्धारण होने से समाज में असंतुलन बढ़ता चला गया और वंचितों एवं अमीरों के बीच खाई बढ़ती गई । विकास के लक्ष्य में गरीबों को प्राथमिकता देनी होगी । प्रखर पत्रकार और विचारक सुधांशु मिश्रा का कहना था कि मशीनों के आने से उत्पादन तो बढ़ा परंतु पूंजी का केन्द्रीकरण तेजी से बढ़ा जिससे गैर बराबरी भयावह हो गई। विकास की प्राथमिकताओं के त्रुटिपूर्ण निर्धारण से अमीर अधिक अमीर और गरीब अधिक गरीब होता गया । इससे गरीबी, बेकारी, भुखमरी जैसी समस्याएँ बढ़ गयी । पूर्व बैंकर और विचारक इंद्र भंसाली ने कहा कि राजनीतिक विकास, आर्थिक विकास, मानसिक विकास और दार्शनिक विकास की बहुआयामी सरणियों विकसित होने से पिछड़े और अधिक पिछड़ते जाते हैं। वित्तीय सलाहकार और साहित्यकार आर के शर्मा ने कहा कि असमानता की पीड़ा से ग्रस्त व्यक्ति गैर बराबरी के अभिशाप से मुक्त होने के लिए सक्रिय होने पर कई बार ऊंची सीढ़ियाँ चढ़ जाता है।अभियान्त्रिकी विशेषज्ञ डीपी चिरानिया कि गैर-बराबरी के लिए अशिक्षा, अंधविश्वास और पारंपरिक सोच जिम्मेदार है। ऐसे मनुष्य को भय, भूख और हीन भावना सदैव प्रताड़ित करती रहती है। योगाचार्य डॉ पुष्पलता गर्ग ने कहा कि धर्म ग्रन्थों में मनुर्भव की अवधारणा से ही गैर बराबरी दूर हो सकती है। संगोष्ठी में आईएएस (रि) आरसी जैन, विष्णुलाल शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार एवं मुख्यमंत्री  के विशेषाधिकारी फारूक आफरीदी, डॉ. हरिदास स्वामी, रमेश खंडेलवाल और ने भी विचार व्यक्त किए।

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