प्रदेश प्रभारी रंधावा के सामने पार्टी नेताओं के बीच आपसी समन्वय एक बड़ी चुनौती।

जयपुर ब्यूरो रिपोर्ट।
भारत जोड़ो यात्रा 16 दिन बाद राजस्थान से विदा तो हो चुकी है। लेकिन यहां के नेताओं में आपसी मतभेद को लेकर बयानबाजी शुरू हो गई है। पंजाब के प्रभारी हरीश चौधरी ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ बयान देकर यह जता दिया है कि वे अब चुप बैठने वाले नहीं है।कहने को तो कांग्रेस की ओर से सुखविंदर सिंह रंधावा को प्रभारी बनाया है और वे 27 दिसंबर को 3  दिवसीय दौरे पर जयपुर पहुंच रहे हैं। 28 दिसंबर को प्रदेश कांग्रेस के नए हॉस्पिटल रोड पर बनाए गए वार रूम में प्रदेश के नेताओं संवाद और परिचय भी प्राप्त कर अपना संदेश देने का काम करेंगे। वहीं दूसरी ओर यह कहा जा रहा है कि जनवरी में प्रदेश में 400 ब्लॉक अध्यक्ष और 30 जिला अध्यक्षों की घोषणा कर दी जाएगी। लेकिन सीएम गहलोत और सचिन पायलट के साथ-साथ कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा भी अपने लोगों को ब्लॉक अध्यक्ष और जिलाध्यक्ष बनाने की कोशिश में जुटे हैं। यही कारण है कि यह नियुक्तियां पिछले काफी समय से अटकी पड़ी है। चुनाव प्राधिकरण को नाम भेजे जा चुके हैं लेकिन आपसी विवाद के चलते इनकी घोषणा नहीं हो पाई। अभी इन नेताओं के बीच आपसी समन्वय कैसे होगा यह एक बड़ी चुनौती है। रंधावा को प्रभारी बनने के बाद उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा को तो सफल रूप से विदा करा दिया है यही नहीं सीएम गहलोत के 4 साल पूरे होने के समारोह में भी उन्होंने जो कुछ कहा उससे लगता है कि वे  सीएम गहलोत को सीधे तौर पर कोई दिशा निर्देश देने में सफल नहीं हो पाएंगे। प्रदेश में वर्ष 2023 में विधानसभा के चुनाव होने हैं और इस चुनाव में किसका नेतृत्व होगा इसका फैसला नहीं हो पाया है। कांग्रेस के मीडिया चेयरमैन जयराम रमेश ने यह कहकर एक नया विवाद पैदा कर दिया कि पार्टी किसी के चेहरे पर चुनाव नहीं लड़ेगी अब यह बरकरार रहेगा या नहीं इसका फैसला तो फिलहाल हुआ नहीं है। राहुल गांधी ने अलवर के सर्किट हाउस में सीएम गहलोत, सचिन पायलट,  केसी वेणुगोपाल और प्रभारी सुखविंदर सिंह रंधावा के बीच क्या कुछ बातचीत हुई और उसके परिणाम क्या कुछ होंगे इसका खुलासा अभी तक नहीं हो पाया है। 23 दिसंबर को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बैठक कर ली है लेकिन उसमें राजस्थान को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ है। बैठक में यह जरूर निर्देश दिए गए हैं कि राहुल गांधी ने जो संदेश दिया है उसकी अनुपालन के लिए देशभर में हाथ से हाथ जोड़ो अभियान 26 जनवरी से शुरू किया जाना है । बिना ब्लॉक अध्यक्ष के यह कार्यक्रम कैसे सफल होगा इसका जवाब  तो किसी के पास नहीं है । यह माना जा रहा है कि इससे पहले ब्लॉक अध्यक्ष और जिला अध्यक्ष की नियुक्ति हो जाए। इसके लिए सीएम गहलोत, सचिन पायलट और डोटासरा के बीच आपसी  संबंध में होना जरूरी है। यह तो अब निश्चित हो गया है कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का छत्तीसगढ़ में आगामी फरवरी माह में होने वाला राष्ट्रीय अधिवेशन में कांग्रेस के उलझे हुए मामले सुलझाए जाएंगे। इसमें राजस्थान का विवाद सबसे महत्वपूर्ण है जिसे खत्म करने के लिए निश्चित रूप से कड़े निर्णय भी लेने पड़ेंगे। फिलहाल राजस्थान की राजनीति में बगावत करने वाले तीन नेता संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल, सरकारी मुख्य सचेतक और जलदाय मंत्री डॉ. महेश जोशी और राजस्थान पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौड़ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने से पायलट गुट के नेताओं में गुस्सा जरूर है। अब देखना यह है कि पार्टी  हाईकमान इस विवाद को कैसे निपटाते हैं। संगठन महामंत्री केसी वेणुगोपाल ने यह कहकर नया संदेश देने का काम किया था कि बगावत करने वाले नेताओं को कोई क्लीनचिट नहीं दी है इसके बाद से इन नेताओं में  डर पैदा हुआ था। यह माना जाने लगा था कि कुछ होने वाला है और हुआ नहीं। शांति धारीवाल ने तो वह रहेंगे नहीं तो उनका कामकाज पूरा हो जाए कोटा के लिए उन्होंने एंपावर्ड कमेटी की बैठक बुलाकर कुछ फैसले भी कर दिए। यह बात तो सही है कि धारीवाल ने सीएम गहलोत सरकार के 4 वर्ष पूरे होने पर जयपुर में पत्रकारों को यह कहकर कोई टिप्पणी नहीं की कि उस पर मैं नहीं बोलूंगा ऐसा लगता है कि उन्हें विवाद पर किसी प्रकार से कोई बयान देने से मना किया गया है। चुप्पी जरूर है लेकिन आपसी संबंध में एक बड़ी चुनौती प्रभारी रंधावा के सामने है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे राजस्थान के विवाद से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं और वह फैसला नहीं कर पा रहे हैं। इसके पीछे कई राजनीतिक और अन्य सवाल जुड़े हुए हैं जो कि यह बताते हैं कि फैसला आसान नहीं है। अब यह स्पष्ट करना होगा कि पार्टी किस संदेश के आधार पर प्रदेश में संगठन और सत्ता को चलाना चाहती है। ढाई साल से संगठन नहीं होने से पार्टी की निचले स्तर पर स्थिति बेहद खराब है उसको सुधारने के लिए प्रभारी को सही तरह की स्थितियों से राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे को अवगत कराना पड़ेगा। नहीं तो अविनाश पांडे और अजय माकन की तरह वे भी आने वाले समय में प्रदेश की गुटबाजी और नेताओं में समन्वय की कमी दूर कर पाने में सक्षम नहीं रहेंगे । अब सवाल जरूर सामने है रंधावा को कठोर निर्णय वाली नीति को अपनाकर नेताओं को संदेश देने का काम करना पड़ेगा नहीं तो राजस्थान में कुछ ऐसे वरिष्ठ नेता है जो कि रंधावा के समक्ष एक नई चुनौती पैदा कर सकते हैं। प्रदेश में व्यापक दौरा शुरू करना पड़ेगा और निचले स्तर की रिपोर्ट लेकर कुछ कठोर फैसले करने से पार्टी में सक्रियता आ सकती है। सीएम गहलोत निश्चित तौर पर प्रभारी को अपना बनाने की कोशिश करेंगे और दूसरी और सचिन पायलट भी अपने बातों को सही तरीके से रखकर फेस लेकर आएंगे तो ही कुछ होगा। राजस्थान का मसला पेचीदा है और यहां पर निर्णय करना भी आसान नहीं है। लेकिन अब सबको यकीन दिलाने के लिए रंधावा को आने वाले समय में आम कार्यकर्ताओं से मिलने का सिलसिला तेज करना चाहिए। इसमें किसी प्रकार की कोई राजनीति करने के बजाय पार्टी के हित में अगर वह कुछ कर पाएंगे तो निश्चित तौर पर अविनाश पांडे और अजय माकन की परिपाटी को तोड़ पाएंगे।

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