कोलेस्ट्रॉल: खोखले दावों से सावधानी की जरूरत - डॉ. रामावतार शर्मा


 भारत में विज्ञापनों की दुनिया बेलगाम हो चली है खासकर टेलीविजन पर होने वाले विज्ञापनों की। बात यहां तक बढ़ गई है कि भारत सरकार को अब एक नीति बनाने की आवश्यकता आ पड़ी है जिसके तरह कोई व्यक्ति यदि किसी वस्तु का उपयोग करता है तो ही उसको विज्ञापित कर सकेगा। मॉडल को यह बताना भी पड़ेगा कि वह धन लेकर यह विज्ञापन कर रहा है। हमारे यहां धड्डले से दावे किए जाते हैं कि आमला और कुछ अन्य तथाकथित जड़ी बूटियों के उत्पाद खा कर सब बूढ़े जवान हो सकते हैं। बिना किसी रसायनिक विश्लेषण के अपने उत्पादों में हजारों तत्व होने का दावा किया जाता है और एक बड़ा वर्ग इन सब बातों को स्वीकार कर लेता है हालांकि सब जानते हैं कि किसी ने कुछ भी भोज्य पदार्थ का उपयोग किया हो जिसकी जवानी गई तो बस फिर गई।

कोलेस्ट्रॉल को लेकर भी पूरी दुनिया में लोग खूब धन बनाने में लगे हैं। कोलेस्ट्रॉल 90 प्रतिशत हमारे स्वयं के शरीर में लीवर द्वारा ही बनाया जाता है और इसको सही रखने के लिए मन की वासनाओं से मुक्त सक्रिय जीवन जीना सबसे कारगर है पर कोलेस्ट्रॉल कम करने के नाम पर कितने ही भोजन सप्लीमेंट बाजार में आ गए हैं जो मनमानी कीमत पर बेचे जा रहे हैं। इन पदार्थों की गुणवत्ता एकसार कभी भी हो नहीं सकती क्योंकि जिस जमीन पर लगातार एक ही फसल की बुवाई होती है वहां के उत्पाद की गुणवत्ता गिर जाती है। धरती को बंजर कर हम गुणवत्ता वाले फलों के दिवास्वप्न देख रहे हैं। सब कुछ जानकर भी कुछ नहीं जानने की कला में सब माहिर हो चले हैं।

इस समय में कोलेस्ट्रॉल को कम करके हृदय के स्वास्थ्य को सुधारने के लिए कोई छह खाद्य पदार्थों को बेचा जा रहा है - मछली तेल के कैप्सूल्स, दालचीनी, लहसुन, हल्दी, लाल चावल तथा प्लांट स्टेरोल जो होते तो कोलेस्ट्रॉल जैसे हैं पर पाए पौधों में जाते हैं। प्लांट स्टेरॉल वनस्पति तेल, बीज और सूखे मेवों में अधिकता से होते हैं। इन सब खाद्य पदार्थों को भारी मुनाफे में बेचने साधु और व्यापारी दोनों लगे हुए हैं पर किसी भी अध्ययन में इनसे कोई चमत्कारी फायदा नहीं पाया गया है हालांकि कुछ अध्ययनों में कुछ प्रतिशत लोगों में थोड़ा बहुत फायदा होता पाया गया है पर फिर भी वह स्टेटिन दवा की न्यूनतम खुराक से भी कम है।

यदि कोलेस्ट्रॉल ही कम करना हो तो स्टेटिन की महज 5 एमजी की गोली कहीं ज्यादा प्रमाणिक तौर पर प्रभावशाली पाई गई है जो कीमत में भी कई गुना सस्ती पड़ती है। उदाहरण के तौर पर लहसुन हर स्थान का अलग अलग होता है, उसके गुण मिट्टी कैसी है जहां वह उगा है इस पर निर्भर करते हैं तो इसके उपयोग से हर जगह एक जैसा फायदा कैसे हो सकता है ? भारत की मिट्टी रसायनों के उपयोग से दूषित हो चुकी है इसीलिए देश के लोग दीर्घकालीन बीमारियों से घिर गए हैं। आज देश की हर गली में डॉक्टर, वैद्य, हकीम, होमियोपैथ और झाड़ फूंक वाले बैठे हैं और सब के यहां भीड़ लगी है। बीमार देश के लोग विश्व शक्ति और विश्वगुरु बनने की घोषणाओं के नशे में झूम रहे हैं पर भूमि, जल और वायु प्रदूषण को रोकने एवम् जीवन में नवीनता लाने के नाम पर पूर्णतया निष्क्रिय तथा दिशाहीन हैं। याद रखिए आप वैसे ही बन जाते हो जैसा अन्न खाते हो और सप्लीमेंट खाने वालों का जीवन सप्लीमेंट्री से उत्तीर्ण होने जैसा ही होता है।

 

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