प्रकृति के अनुसार जीना ही आदर्श जीवन है- हरिराम मीणा।

जयपुर ब्यूरो रिपोर्ट।
प्रकृति के अनुशासन के अनुरूप जो जीवन जीया जाएगा, वही आदर्श जीवन है। प्रकृति, मानव और जीव-जंतु, जहां इन तीनों में तालमेल है, सामंजस्य दिखाई देता है, मैं उसे ही आदिवासियत मानता हूं। यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकार हरिराम मीणा का। कलमकार मंच की ओर से राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से विद्याश्रम के सुरुचि सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्यकार हरिराम मीणा से कथाकार उमा ने संवाद किया।संवाद में हरिराम मीणा ने कहा, अगर हम भारतीय परंपरा को देखें तो राम और कृष्ण के जीवन से भी प्रकृति प्रेम का ही दर्शन होता है। राम के वनवास काल को अगर निकाल दिया जाए तो उनके बाकी बचे जीवन से क्या प्रेरणा ले सकते हैं? शबरी, केवट, जामवंत, सुग्रीव और हनुमान जैसे मित्र उन्हें वनवास काल में ही मिले, जिन्होंने अपने कृतित्व से कुछ ना कुछ सिखाया ही है। 
वहीं कृष्ण के पूरे जीवन दर्शन में गो-पालक, बांसुरी वादक और गोवर्धन का महत्व विशेष रूप से उल्लेखित किया गया है।संवाद के पूर्व कलमकार मंच के राष्ट्रीय संयोजक निशांत मिश्रा ने संस्थान के उद्देश्यों और रचनात्मक प्रयासों की जानकारी दी। वरिष्ठ कवि और गजलकार एसीपी सुनील प्रसाद शर्मा ने भी विचार व्यक्त किए। वरिष्ठ कवि, अनुवादक और आलोचक डॉ. दिविक रमेश ने कहा कि हरिराम मीणा के रचना कर्म से हम वैसे तो पहले से परिचित हैं, लेकिन इस संवाद में सम्मिलित होकर हम और समृद्ध हुए हैं।इस कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार नन्द भारद्वाज, फारूक आफरीदी , व्यंग्यकार और संपादक डॉ. लालित्य ललित, प्रभात गोस्वामी, स्मिता शुक्ला, डॉ. तारावती, प्रेम लता शर्मा, नवल पांडे, अवनीन्द्र मान, महेश कुमार, नितिन यादव, अनुपमा तिवाड़ी, रवि बालोठिया, चरणसिंह पथिक व गजेंद्र एस श्रोत्रिय, भागचंद गुर्जर, प्रेमचंद गांधी, रमेश खत्री, विजय आनंद गुप्ता सहित बड़ी संख्या में साहित्यानुरागी उपस्थित रहे।श्रोताओं ने लेखक से कई प्रश्न भी किए इसके उन्होंने धैर्यपूर्वक उत्तर दिए।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ARwebTrack